Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 197, Verses 3–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 197, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 197 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने
कहा : हे भगवन्, हे मुनिनायक, आपसंशयरूपी मेघ के लिए शरत्काल के सदृश हैँ । इस समय मेरे मन
में एक हल्का-सा सन्देह उत्पन्न हो गया हे । पूर्वोक्त प्रकार से संसाररूपी सागर से पार लगानेवाला
यह महाज्ञान सकल वाक् प्रपंच के परे है । यानी वाक् प्रपंच का विषय नहीं है