Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, Verses 29–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, verses 29–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 181 · श्लोक 29-34
संस्कृत श्लोक
यमिमे पश्यथः साधू कदम्बतरुपुत्रकम् ।
मदास्पदमरण्यान्या धम्मिल्लमिव पुष्पितम् ॥ २९ ॥
तदा तेनेह विस्तीर्णमभवद्धनकाननम् ।
गौरीवनमिति ख्यातं भूषितं कुसुमर्तुभिः ॥ ३० ॥
मन्दारकुन्दमकरन्दसुगन्धिताशं संसूच्छ्वसत्कुसुमराशिशशाङ्कनिष्ठम् ।
संतानकस्तवकहासविकासकान्तमामोदिमारुतसमस्तलताङ्गनौघम् ॥ ३३ ॥
पुष्पाकरस्य नगरं नवगीतभृङ्गं भृङ्गाङ्गनाकुसुमखण्डकमण्डपाढ्यम् ।
चन्द्रांशुजालपरिकोमलपुष्पदोलादोलायमानसुरसिद्धवधूसमूहम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
मौन तपस्वी के आगे वेगरहित होकर कालजन्य शीतोष्णादि वेगोँ को सहता हुआ मैं छः महीने तक
रहा । एक दिन सूर्यबिम्ब से निकलकर उस प्रदेश में स्थित हुए भानु की तरह चमकते हुए किसी पुरुष
को मेने देखा । जब उस तपस्वी ने मन से और मैंने कर्म से (अर्घादि से) उसकी (पुरुष की) पूजा की
तब वह अमृतद्रव की भोति सुन्दर वचन बोला : हे शाखाओं में लटके हुए दीर्घकाल से तपस्या में
निरत ब्रह्मन्, देह का संहार करनेवाली इस तपश्चर्या को समाप्त करो ओर अपना अभिमत वर ग्रहण
करो | तुम इसी देह से सप्त समुद्रो से वेष्टित सप्तद्वीपवती मही का सात हजार वर्ष तक धर्मपूर्वक
पालन करोगे