Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verses 41–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, verses 41–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
उद्धरेद्वृक्षतस्तक्षा कदाचिच्छालभञ्जिकाम् ।
अद्वितीयाच्चितिस्तम्भादुत्कीर्णां कः करोति ताम् ॥ ४१ ॥
स्तम्भे जडेन सा व्यक्तिमनुत्कीर्णेह गच्छति ।
चिति त्वन्तर्गता चित्त्वादेवात्मन्येव भात्यलम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए जिस प्रकार इस जगत् का भान होता हे वैसा ही भान हो । भान होनेपर भी वह
चिदाकाशरूप होने से न सर्वथा सत् है ओर न असत् ही है, वह प्रपंचरूप कुछ भी नहीं है, किन्तु
अनिर्वचनीय ही हे