Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
खेचरप्रतिबिम्बेन विद्रवद्भिरितस्ततः ।
भग्नबन्धबृहत्सेतून्क्षणं प्रति जलेचरैः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार बंग के योद्धा भी हिमालय की औषधियाँ खाकर मनुष्यो की नाई म्लान
(कुम्हलाए) शेखर पुष्पों से युक्त हो बाणों के चुक जाने से केवल धनुषों से युक्त हो अपने-अपने
घर आये, मारे भय के आज भी बाहर न निकलने के कारण पिशाचता को प्राप्त हए जैसे दिखाई
नहीं पड़ते