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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

रत्नांशुजालसंदिग्धास्तरङ्गादेशबिम्बिताः । परिवर्तयतः फुल्लास्तीरतालीवनावलीः ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

जो योद्धा सह्ाद्रि में प्रविष्ट हुए थे, वे तो मूकाम्बिका के समीप कुटजाढ्य नामक सह्याद्रिशिखर के देवबिल में भाग्यवश प्रविष्ट हुए, उक्त बिल से उन्हें एेहिक ओर पारलौकिक सिद्धि प्राप्त हो गई । कभी-कभी भाग्योदय में अचानक अनर्थ से भी अर्थ (पुरुषार्थ) हस्तगत हो जाता है, कारण कि मरने के लिए वे सुरबिल में घुसे थे, किन्तु उन्हे सिद्धियाँ मिल गई