Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verses 43–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, verses 43–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 43-49
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
गरज रहे
प्रलयकाल के मेघो से, बह रहे प्रलयकाल के प्रचण्ड वायुओं से,गिर रही प्रलयकालीन मूसलाधार
वृष्टि से, प्रलयकाल के वजपातरूपी संकटों से, पंकमय सकल भूतलों से, जल से उपद्रवपूर्ण
स्थलों से, तेज शीत से जम गई वर्षाधारों के आकार के आकाश में बने पिंजड़ों से, समस्त
नगर, गाँव ओर घरों को जलाकर राख कर चुकी अग्नियों से, प्रजा, घोडे, हाथी ओर पैदल
सेनाओं के रोदन से, आकाश ओर भूमि में हो रहे तीक्ष्ण ध्वनिवाले रथ और मेघो के घर-
घर शब्दों से, चारों ओर विपश्चित् के धनुष के चार तेज क्रेंकारों से, बिजलीरूपी कंकण का
विस्तार करनेवाले मेघो के परस्पर टकराने और रगड़ खाने से, बाणो, शक्तियों, मुद्गरो,
बल्लमों, भालों और बन्दूकों की वर्षाओं से चारों ओर बलशाली राजाओं के असंख्य सैनिक
भागते हुए मच्छरों के समूह की भाँति शीघ्र नष्ट हो गये । सीमान्त के राजाओं की सेनाएं तीक्ष्ण
वहिराशि के सदृश शस्त्रास्त्र समूहरूपी मेघों की आग से लोगों को घबड़ाहट में डाल देने वाले
वज़पातों से व्याकुल होकर चंचल सागरजल में उबाले जा रहे जलचरों की नाई बडवाग्नि में
प्रवेश कर रही थीं