Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verses 32–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, verses 32–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 32-38
संस्कृत श्लोक
विशल्यकरणीं भुक्त्वा काकतालीययोगतः ।
हिमाद्रौ हैहया याता गृहं विद्याधरा इव ॥ ३२ ॥
पृष्ठनृम्लानकुसुमा धनुर्भिर्गृहमागताः ।
वङ्गा नाद्यापि दृश्यन्ते पिशाचत्वमिवागताः ॥ ३३ ॥
अङ्गा वनफलैर्भुक्तैर्विद्याधरपदप्रदैः ।
विद्याधरीभिः क्रीडन्ति दिवि विद्याधराः स्थिताः ॥ ३४ ॥
तालीतमालखण्डेषु पतिताः पातिताङ्गकाः ।
पारसीका गता मोहं भ्रमाद्वैमानिका इव ॥ ३५ ॥
तरलासारमातङ्गं पतितं तङ्गणाङ्गणे ।
अङ्गैरंग कलिङ्गानां चतुरङ्गं वलं हतम् ॥ ३६ ॥
क्रमत्यरिबले साल्वाः शरशैलोदकोदरे ।
पतिताः प्रभुणा सार्धमद्याप्येवोपलाः स्थिताः ॥ ३७ ॥
असंख्याः प्रपलायन्तः ककुभं ककुभं प्रति ।
नराः सरत्तरङ्गेषु सागरेषु लयं गताः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
सेना पर्वत नदी की समता का उपपादन करते हुए भाग रही सेना का वर्णन करते है /
वायु के प्रवाह में यह बह रहे पसीने से तर कटे हुए बड़े-बड़े पताका-दण्ड ही उस
गिरिनदीरूप सेना में वृक्ष थे, किरणरूपी फूलों से चितकबरे (मिश्रित) चंचल खड्ग ही लताओं
के समूह थे, दौड़ने की शक्ति न होने से लड़खड़ा रहे, मोटे ताजे पुरुषरूपी पत्थरों के
बिन्दुरूपी खून के पनाले से वह अवर्णनीय थी, भयंकर घुर-घुर शब्दों से वह कायरों के हृदय
को टुकड़े-टुकड़े करनेवाली (डरावनी) थी, बह रहे महागजों के दाँतरूपी वृक्षों के परस्पर
टकराने से प्रकट हो रहे कट-कट शब्द से गरज रहे मेघों को मात कर रही थीं, हथियारों से
पत्थरों की तेज टक्कर ही उसमें नदी के किनारे के पुष्पवृक्ष पर हुआ भँवरों का झंकार था,
तैर रहे चंचल तथा चिल्ला रहे घोड़े ही उसकी तरंगें थीं । रथादि के तथा शूरवृन्द के पत्थरों
से टकराने पर हुए आर्तस्वररूपी मेढक तथा पक्षियों के शब्द से युक्त थी, पैदल सेना, रथ,
हाथी और अश्वरूपी पाषाणों के परस्पर टकराने से वह संकुल थी, कर्णकटु टंकार, चीत्कार,
क्रेंकार से पुष्ट थी, हम मरे हम मरे इस प्रकार के जनकोलाहल से भरी थी, सेनारूपी जल
के बड़े-बड़े आवर्तो में गुड़-गुड़ ध्वनि हो रही थी, रक्त के कण तथा कुहरारूपी सन्ध्याकाल
का मेच उसका चंदवा था