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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verses 23–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, verses 23–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 23-28

संस्कृत श्लोक

आसारसाराः पङ्काम्बुप्लुताः सघनघुंघुमाः । आसन्दशदिशोऽदृश्या बहुक्षुब्धायुधानिलैः ॥ २३ ॥ निर्ह्रादकारिभिर्वातैर्वहच्छपछपारवम् । प्रसस्रुर्भुवि नीहारा महार्णवरया इव ॥ २४ ॥ आयुधौघेऽपि चक्रौघात्पादातं वलमाविलम् । रजोराशिरिवासारे न समर्थं पलायने ॥ २६ ॥ हूणा आमस्तकं मग्ना उत्तरार्णवसैकते । क्लिन्नास्तत्रैव पङ्कान्तः पूरणाविलशूलवत् ॥ २७ ॥ तीरैलावनलेखासु शकाः पूर्वपयोनिधेः । नीता बद्ध्वा दिनं मुक्ता न गता यमसादनम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

चारों ओर वायव्यास्त्र और पर्जन्यास्त्र से युक्त अतएव अष्टमूर्ति उस भीषण धनुष से दिशाओं के अवकाश को पाट देनेवाली बाणों की नदियाँ, त्रिशूलों की नदियाँ, चक्रों की नदियाँ, कुल्हाड़ों की नदियाँ, तोमरं की नदियाँ भिन्दिपालों (तोपों) की नदियाँ, पत्थरों की नदियाँ, वजो की नदियाँ और बिजलियों की नदियाँ बह निकलीं । कल्पान्त के (प्रलय) सूचक प्रचण्ड वायु बहने लगे जलधारा की नदियों के प्रवाह तलवारों की वृष्टि के साथ बह निकले । युगो के अवसान में टूट फूटकर धराशयी हुए कुलपर्वतों से निकले हुए, प्रचण्ड वायु से बढ़े हुए, उत्पातां के समान मोटे ताजे साँप बाणों के साथ बह निकले