Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verses 19–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
चारुसारङ्गरङ्गासु शैलकाननभूमिषु ।
चतुर्दिक्कं तदापातैः संपन्नं क्षोभणं घनम् ॥ १९ ॥
कण्टकस्थलनामानः कण्टकस्थलकर्कशाः ।
कण्टकस्थलगा आसन्कण्टकस्थलमण्डले ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्तसंग्राम सागर को देखकर मैं इसका अगस्त्य (अगस्त्य ने जिस प्रकार सागर
(४) सागरपक्ष में मगरों के समूहों से भरा हुआ । जलहस्तियों के समूह से भरा हुआ ।
को पी लिया था वैसे ही इसे पी डालूँ) ऐसा मन में विचार कर उसने संग्राम सागर को पीने के लिए
वायव्य अस्त्र का स्मरण किया और जैसे मेरुरूप धनुष में त्रिपुरासुर के वध के लिए उद्यत हुए
शिवजी ने अस्त्र का सन्धान किया था वैसे ही चारों ओर उसने उसका सन्धान किया