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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verses 51–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, verses 51–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 51,52

संस्कृत श्लोक

अस्नेहेनेव दीपेन येन सर्वं समुज्झितम् । सस्नेहेनेव दीपेन तेन सर्वं प्रकाशितम् ॥ ५१ ॥ स्थितं सर्वं परित्यज्य यः शेतेऽस्नेहदीपवत् । स राजते प्रकाशात्मा समः सस्नेहदीपवत् ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीलिए सर्वत्याग होने पर सबका बाध हो जाने के कारण परमार्थद्ृष्टि से आत्यन्तिक स्नेह का क्षय होने से बुझे हुए दीपक का दृष्टान्त तथा सर्वगतस्वरूप की ज्योति से सम्पूर्ण व्यवहारों का प्रकाश होने के कारण व्यवहारद्ष्टि से तैलसहित दीपक का दृष्टान्त कहते हैं। तैलरहित दीपक की नाई निर्वाणपद को प्राप्त हुए जिसने अनासक्ति से सबको छोड़ दिया, तैलसहित दीपक की नाई प्रकाशमान ज्योतिःस्वरूप उसने सबको प्रकाशित किया । प्रतीयमान सबका परित्याग करके जो तैलरहित दीपक की नाई निर्वाणपद में अवस्थित रहता है, सर्वरूप प्रकाशात्मा वह तैलसहित दीपक की नाई प्रकाशता हे