Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 22, 23
संस्कृत श्लोक
सुखदुःखादिभूत्या हि नापराधि शरीरकम् ।
नात्मनः फलवानात्मस्पन्दे वृक्षोऽपराधवान् ॥ २२ ॥
वातः फलशिरःपुष्पपातनं कुरुते स्फुरन् ।
तरुणा साधुना धीरापराद्धं किमात्मनः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
सुख और दुःख की उत्पत्ति का स्थान होने से शरीर अपराधी क्यों नहीं है, इस पर कहते हैं।
सुख, दुःख आदि का उद्भवस्थान होने मात्र से शरीर अपराधी नहीं माना जा सकता, क्योकि
इसमें दृष्टान्त है-फलवान् वृक्ष । वायु द्वारा आत्मस्पन्दन (फल आदि का पतन) होनेपर फलवान् वृक्ष
के अभिमानी आत्मा का कोई अपराध माना नहीं जा सकता स्पन्दनशील वायु ही, फल, ऊपर के
पल्लव, पुष्प आदि को बलपूर्वक गिरा देता है, इसलिए वायु का ही अपराध मानना चाहिए, बेचारे साधु
वृक्ष का क्या अपराध ? बस, इसी तरह साधु शरीर ने साधु आत्मा का कौन अपराध किया ?