Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verses 1–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, verses 1–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 1-6

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथोत्थाय ददाहासौ शुष्कं तत्तृणमन्दिरम् । अज्ञेन स्वेन मनसा वृथा संकल्पकल्पितम् ॥ १ ॥ शिष्टं यत्किंचिदभवत्तत्सर्वं स शिखिध्वजः । असंरब्धमना मौनी क्रमेण समया धिया ॥ २ ॥ ददाह च स चिक्षेप तत्याज च बभञ्ज वा । भाण्डजातं स्ववसनं भोजनाद्यपि तुष्टवत् ॥ ३ ॥ स बभूवाश्रमस्तस्य दृष्टनष्टजनस्थितिः । वीरभद्रबलध्वस्तदक्षयज्ञाश्रमोपमः ॥ ४ ॥ आश्रमात्ते मृगगणास्त्यक्तरोमन्थमुद्ययुः । साग्निदाहात्पुरवराद्भीतभीतजना इव ॥ ५ ॥ भाण्डजातं दहत्यग्नौ सहशुष्केन्धनेन तत् । केवलाकृतिरस्नेहस्तुष्टिमानाह भूपतिः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

तिरानबेवाँ सर्ग सारी सामग्री जलाकर छोड़ देने के लिए तैयार राजा शिखिध्वज को रोककर कुम्भ द्वारा चित्तत्याग के लिए उपदेश देना । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, इसके बाद उठकर राजा शिखिध्वज ने अज्ञानी अपने मिथ्याभूत मन से संकल्प द्वारा समर्थित उस कुटीरूप शुष्क तृणमन्दिर को जला दिया। जो कुछ वस्तुएँ वहाँ बच गयी थीं उन सबको - शांतचित्त मौनी उस राजा शिखिध्वज ने क्रमशः समान बुद्धि से युक्त होकर - जला डाला, इधर-उधर फेंक दिया, किसी को दे दिया तोड़-फोड़कर नष्ट कर दिया । हे श्रीरामजी, आपसे क्या कहूँ, अन्त में उसने अपनी लँगोटी तथा भोजनपात्र को भी नहीं रहने दिया । राजा शिखिध्वज के उस आश्रम से, जहाँ अनेक जन पहले देखे गये थे, आज वे सब लोग विलुप्त हो गये; वह वीरभद्र के बल से ध्वस्त दक्ष के यज्ञ के आश्रम के सदृश हो गया । वे मृगों के झुण्ड जुगाली छोड़-छोड़कर आश्रम से उस प्रकार भागने लगे, जिस प्रकार अग्निदाह से युक्त किसी श्रेष्ठनगर से अत्यन्त भयभीत होकर मनुष्य भागने लगते हैं सूखी लकड़ी के साथ जब वह सम्पूर्ण पात्र आदि अग्नि में जल रहा था तब देहमात्र अवशिष्ट, स्नेहशून्य ओर सन्तुष्ट राजा बोलने लगा

सर्ग सन्दर्भ

बानबेवाँ सर्ग समाप्त (८) राजा शिखिध्वज ने अग्नि में शुद्ध करके किसी एक श्रोत्रिय ब्राह्मण से वह कमण्डलु लिया था, अब फिर अग्नि में उसे शुद्ध करके किसी एक दूसरे श्रोत्रिय ब्राह्मण को दे दिया, यह “येनैव” इत्यादि से मालूम पड़ता है ।