Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, Verses 15–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 15-17
संस्कृत श्लोक
चिन्तैव चित्तमित्याहुः संकल्पेतरनामकम् ।
तस्यामेव स्फुरन्त्यां तु चित्तं त्यक्तं कथं भवेत् ॥ १५ ॥
चित्ते चिन्तागृहीते तु त्रिजगज्जालके क्षणात् ।
कथमासाद्यते साधो सर्वत्यागो निरञ्जनः ॥ १६ ॥
संकल्पग्रहणेनान्तस्त्यागः प्रोड्डीय ते गतः ।
शब्दसंश्रवणेनाङ्ग यथा ग्रामविहंगमः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
उस पुरुष का त्याग भला कैसे सिद्ध हो सकता है, जो चिन्ता को तनिक
भी अपनाता है। पवन के स्पन्द से युक्त वृक्ष में निश्वलता कैसे हो सकती हे ।।१४॥
(~) महाभारत आदि में भगवान् गरुड की यह कथा प्रसिद्ध है ।
चित्तत्याग ही मुख्य सर्वत्याग है, लेकिन चिन्ता के रहते चित्त का त्याग अत्यन्त कठिन है। चित्त ने
तो अपने संकल्प द्वारा जगत् को ही बटोर लिया है, इसलिए हे राजन्, अभी आपने किसीका भी त्याग
सिद्ध नहीं किया, इस अभिप्राय से कहते हैं।
चिन्ता को ही चित्त कहते हैँ, इसीका दूसरा नाम संकल्प है । उस चिन्ता के स्फुरित रहते चित्त का
त्याग कैसे हो सकता है ? हे साधो, तीनों जगत् के जाल के आधारभूत चित्तके क्षण भर में ही चिन्ता से
गृहीत हो जाने पर निरंजन सर्वत्याग की प्राप्ति कैसे हो सकती है ? हे राजन्, जैसे गाँव के पक्षी कबूतर
आदि शब्द श्रवण से उड़कर कहीं चले जाते हैं, वैसे ही आपका त्याग आन्तरिक संकल्प के ग्रहण से
उड़कर चला गया हे