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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 83, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 83, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

अन्यत्करोति पुरुषः फलमन्यदेव प्राप्नोति यत्र्त्रिषु जगत्स्ववलोक्यते च । तस्मादनन्तरभवस्य जगद्भ्रमस्य श्रेयोऽतिवाहनमसङ्गमनिच्छयैव ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

हो जाने पर तो प्रारन्धशेष से जो कुछ जागतिक भ्रम अवशिष्ट रहता है उसका एकमात्र उपेक्षा से ही नाश सिद्ध है, इसलिए उसके नाश के लिए किसी तरह के दूसरे यत्न की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, यह कहते हैँ । हे श्रीरामचन्द्रजी, मनुष्य बड़े परिश्रम के साथ अन्य कार्य करता है और उस कार्य का फल उसे प्राप्त होता है अन्य ही | चूँकि तीनों जगत्‌ में ऐसा ही देखा ओर सुना जाता है, इसलिए आत्मलाभके अनन्तर प्रारब्धशेष रहने से उपस्थित जागतिक भ्रमको असंग ओर अनिच्छा से ढोते चलना ही कल्याणप्रद है