Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, Verses 14–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, verses 14–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 14-22
संस्कृत श्लोक
श्रुतं त्वया योगसाध्यमणिमाद्यर्थसाधनम् ।
ज्ञानसाध्यमिदानीं त्वं श्रृणु श्रवणभूषणम् ॥ १४ ॥
एकं चिन्मात्रमस्तीह शुद्धं सौम्यमलक्षितम् ।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं शान्तं न जगन्न जगत्क्रिया ॥ १५ ॥
तच्चिनोत्यात्मनात्मानं संकल्पोन्मुखतां गतम् ।
यदा तदा जीव इति प्रोक्तमाविलतां गतम् ॥ १६ ॥
असत्यमेव संकल्पभ्रमेणेदं शरीरकम् ।
जीवः पश्यति मूढात्मा बालो यक्षमिवोद्धतम् ॥ १७ ॥
यदा तु ज्ञानदीपेन सम्यगालोक आगतः ।
संकल्पमोहो जीवस्य क्षीयते शरदभ्रवत् ॥ १८ ॥
शान्तिमायाति देहोऽयं सर्वसंकल्पसंक्षयात् ।
तदा राघव निःशेषं दीपस्तैलक्षये यथा ॥ १९ ॥
निद्राव्यपगमे जन्तुर्यथा स्वप्नं न पश्यति ।
जीवो हि भाविते सत्ये तथा देहं न पश्यति ॥ २० ॥
अतत्त्वे तत्त्वभावेन जीवो देहावृतः स्थितः ।
निर्देहो भवति श्रीमान् सुखी तत्त्वैकभावनात् ॥ २१ ॥
अनात्मनि शरीरादावात्मभावनमङ्ग यत् ।
सूर्याद्यालोकदुर्भेदं हार्दं तद्दारुणं तमः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
योगसिद्धि के अनुसार कहे गये स्थूल और सूक्ष्म भावप्राप्तिक्रमों का उपसंहार कर उनसे विलक्षण
प्रकृत मेँ परमोपयोगी ज्ञानसाध्य क्रम का श्रवण कराते है।
हे श्रीरामचन्द्रजी, योग से साध्य अणिमादि पदार्थो का साधन आप सुन चुके, अव श्रवणभूषण
ज्ञानसाध्य क्रम आप सुनिये। एक, शुद्ध, सौम्य, अलक्षित, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर ओर शान्त चिन्मात्र वस्तु
इस संसार में हे ओर न यह जगत् है न इसकी कोई क्रिया हे । वह चिन्मात्र जब अध्यास से अपने को
स्वयं संकल्प की ओर उन्मुख करता है उस समय कलुषता को प्राप्त हुआ “जीव” कहा जाता है । ओर
वही जीव असत्य ही इस शरीर को संकल्पभ्रम से उस तरह देखता है, जिस तरह मूढात्मा बालक उद्धत
यक्ष को । जब ज्ञानदीप से उत्तम प्रकाश हो जाता है तब इस जीव का संकल्प मोह उस तरह क्षीण हो
जाता है, जिस तरह शरत्काल में मेघ । हे राघव, तव संकल्प के क्षय से यह स्थूल शरीर सर्वथा उस तरह
शान्ति को प्राप्त हो जाता है, जिस तरह तैल का क्षय होनेपर दीपक | निद्रा का नाश होने पर जैसे प्राणी
स्वप्न नहीं देखता, वैसे ही सत्य का साक्षात्कार होनेपर जीव देह को नहीं देखता । अतत्त्वभूत शरीर
आदि में तत्त्व की भावना से यह जीव देह से आवृत्त होकर स्थित रहता है ओर एक ब्रह्मतत्त्व की भावना
से देहशून्य श्रीमान् ओर सुखी रहता हे । हे रामभद्र, अनात्म शरीर आदि में जो आत्मा की भावना है वह
हृदयगत भयंकर अंधकार है । वह सूर्य आदि के प्रकाश से दूर नहीं किया जा सकता