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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 72, Verses 7–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 72, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 7, 8

संस्कृत श्लोक

सूक्ष्मत्वादप्यलभ्यत्वात्परमात्मा परोऽणुकः । अनन्तत्वादसावेव प्राप्तो मेर्वादिमूलताम् ॥ ७ ॥ अणोरप्यत्यनन्तस्य पुंसोऽस्य जगदाद्यपि । परमाणुवदाभाति प्रतीतत्वादरूपवत् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

अणुपद की प्रवृत्ति में कारण बतलाते है । सूक्ष्म तथा अलभ्य होने के कारण परमात्मा परमाणुस्वरूप है। इस तरह परमात्मा के सूक्ष्म होनेपर भी उसके पूर्णस्वरूपता में कुछ भी हानि नहीं आती, इसलिए ब्रह्माण्डादि भी उस परमात्मा की दृष्टि से यानी उस परमात्मा की अपेक्षा अतिपरिच्छिन्न होने के कारण परमाणुप्राय ही हैं । इस रीति से ब्रह्माकाशभूतौध० । इस पंचम प्रश्न का भी उत्तर हो गया, इस अभिप्राय से कहते हैं। अनन्त होने के कारण परमात्मा ही मेरूपर्वतपर्यन्त ब्रह्माण्ड आदि का आधार हुआ है। परमाणुस्वरूप होते हुए भी अनन्तात्मक इस पुरुष के (परमात्मा के) ब्रह्माण्ड से लेकर मेरुपर्यन्त पाँचों पदार्थ परमाणु से भी अत्यन्त सूक्ष्म तत्‌-तत्‌ आकारों की वृत्तियों से परिच्छिन्‍्न चितिकणों से परिच्छेद्य होने के कारण स्वाप्निक ब्रह्माण्ड की नाई स्वरूपरहित हैं और वे अत्यन्त सूक्ष्म नाडियों के छिद्रो मे भासमान होने के कारण परमाणु के सदृश हैं