Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 72, Verses 10–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 72, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
अस्य वै ज्ञप्तिमात्रस्य मज्जामात्रं जगत्त्रयी ।
विज्ञानमात्रमध्यं हि साधो विद्धि जगत्त्रयम् ॥ १० ॥
विज्ञानमात्रकलनाकलितं जगन्ति शान्तस्वभावसुकुमारमनन्तरूपम् ।
वेतालबालक पदं तदलङ्घनीयमेवं स्वयं समनुभावय शान्तमास्स्व ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
"शिलान्तर्निबिडेकान्तरूपमज्जा जगत्त्रयी* इस अंश को प्रकट करते है ।
हे साधो, यह जगत्त्रयी ज्ञानमात्र परमात्मा की केवल मज्जा है, क्योकि “द्यावापृथिवी अन्तरेव
समाहिते" इत्यादि श्रुतियो में हृदयाकाशरूप विज्ञानमात्र का मध्य मज्जा की नाई प्रसिद्ध है, यह समझ
लो। हे अज्ञानी वेताल, ये जो जगत् हैं वह विज्ञानस्वरूप आत्मा के अनेकविध कौशलों का विलास हे ।
(४) परमात्मा असल में न तो रुपादिमान् होकर महान् है और न रूपादिस्वरूप ही है, इसलिए
चक्षु आदि इन्द्रियों से उसका किसी तरह भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । इस स्थिति में परमाणु में
इन्द्रयग्राह्यत्व के सदृश इसमें इन्द्रियग्राह्यत्व नहीं है, यह बतलाने के लिए परमात्मा को “परमाणु
कहा गया है । ऐसा कोई भी स्थान नहीं है, जहाँ परमात्मा की सत्ता न हो, सभी जगह परमात्मा की
सत्ता है, इसलिए सबसे बड़ा होने के कारण महान् कहा गया है, यह तात्पर्य है ।
अनन्तस्वरूप, शान्तस्वभाव एवं अत्यन्त सुकुमार उस मदुक्त आत्मविज्ञान का तुम खंडन नहीं कर
सकते, इसलिए मेरे वचनो के अनुसार तुम स्वयं उक्तस्वभाव आत्मा को अपने अनुभव पर चढाओ और
दर्पं छोडकर शान्त हो जाओ