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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, Verses 17–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, verses 17–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 17-28

संस्कृत श्लोक

नानाताकलनेयं च न वल्गति न शाम्यति । चेतो न चेतो नाचेतो न सन्नासन्न चेतरत् ॥ १७ ॥ अविभागमनभ्यासं यदनाद्यन्तमास्थितम् । ध्यायतोऽध्यायतश्चैतत्सौषुप्तं मौनमुच्यते ॥ १८ ॥ यथाभूतमिदं बुद्ध्वा जगन्नानात्वविभ्रमम् । यथास्थितमसंदेहं सौषुप्तं मौनमेव तत् ॥ १९ ॥ अनेकसंविद्रूपात्म शिवेनैवेदमाततम् । इत्यास्थितमनन्तं यत्सौषुप्तं मौनमुच्यते ॥ २० ॥ आकाशं नैव चाकाशं सर्वमस्ति च नास्ति च । इति चित्तं समं शान्तं यत्तन्मौनं सुषुप्तवत् ॥ २१ ॥ सर्वशून्यं निरालम्बं शान्तिविज्ञप्तिमात्रकम् । न सन्नासदिति यस्यामासितं मौनमुत्तमम् ॥ २२ ॥ भावाभावादशादेशविशेषैर्वितथोत्थितैः । संविदो यदनाभासस्तन्मौनं परमं विदुः ॥ २३ ॥ अत्यन्तमसतैवान्तश्चेतसाऽवृत्तिरूघिणा । यदनावर्तनं संविद्वृत्तेस्तन्मौनमक्षयम् ॥ २४ ॥ नाहमस्मि न चान्योऽस्ति न मनो न च मानसम् । इति संविदसंवित्तिरविच्छिन्नातिमौनिता ॥ २५ ॥ अहमस्मि जगत्यस्मिन्स्वस्ति शब्दार्थमात्रकम् । सत्तासामान्यमेवेति सौषुप्तं मौनमुच्यते ॥ २६ ॥ यस्मात्संविदमेव स्यात्स्वान्यादिकलना कुतः । अनन्तमेव सौषुप्तं सर्वं मौनमतस्ततम् ॥ २७ ॥ सुषुप्तमौनमेवेदमनन्तत्वात्प्रबोधवत् । तुर्यमेवामलं विद्धि तुर्यातीतमथापि च ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस अवस्था में यह अनेकता की कल्पना न तो उत्थित होती है और न शान्त ही होती है। (ज्ञान से बाधित चित्त कैसे अवस्थित रहता है, यह कहते हैं।) चित्त ज्ञान से बाधित होने से न चित्तरूप रहता है, न अचित्त रहता है तथा न सत्‌, न असत्‌ ओर न अन्यस्वरूप ही रहता है । विभाग करनेवाले विकल्प के नाश से विभागशून्य अतएव अभ्यास की अपेक्षा से रहित, अपरिच्छिन्न आत्मस्वरूप होने से आदि और अन्त से शून्य जो ध्यान कर रहे या न कर रहे पुरुष का अवस्थित रूप है, वही सुषुप्तमौन कहा जाता है। संसाररूपी अनेक विभ्रमो के अधिष्ठानभूत इस आत्मतत्त्व को यथार्थरूप से जानकर सन्देहरहित जो रूप अवस्थित रहता है वही सुषुप्तमौन हे । अनेक तरह के संविद्रूपों का आत्मा जो शिव है उसीसे यह सारा जगत्‌ परिपूर्ण है, इस तरह के ज्ञान से युक्त जो अनन्त अवस्थान (स्थिति) है वह सुषुप्त मौन कहा जाता है। यह सम्पूर्ण जगत्‌ चिदाकाश का विवर्त होने से आकाशरूप, मूर्तिमान्‌ होने से आकाशस्वरूप से भिन्न, अधिष्ठानसत्ता की सद्रूप से प्रतीति होने से अस्तित्व से युक्त तथा कल्पित होने से नास्तित्व से युक्त हे यानी यह सम्पूर्ण जगत्‌ अधिष्ठानरूप से सत्‌ ओर कल्पित होने से असत्‌ है। यों ब्रह्म से अलग जगत्‌ की सत्ता नहीं हे, यह निश्चय करके जो एकाकार, निर्विकार चित्त अवस्थित रहता है वह सुषुप्त के तुल्य मोन कहा गया है । सर्वशून्य, आलंबनरहित, शान्तिस्वरूप, विज्ञानमात्र तथा जीवन्मुक्तदशा में जो न सद्रूप ओर न असरूप अवस्थान (स्थिति) है वह उत्तममोन कहा गया हे । वितर्तरूप अज्ञान से उत्पन्न भावअभावस्वरूप दशा तथा देशविशेषों से जो संवति का अविवर्त है, उसे परममोन कहते हैं । बाधित होने के कारण अत्यन्त असत्‌ तथा बाह्याकार वृत्ति से शून्य चित्त से जो संविद्वृत्ति का भीतर अनावर्तन (अपरिवर्तन) है उसे अक्षयमौन कहते हैं । जिस दशा में “न मैं हू न अन्य है, मन है ओर न मनका विकल्प है” - इस तरह के तत्त्वज्ञान से बाधित चित्त का जो संवित्‌ से अविच्छिन्न (निरन्तर-लगातार) अप्रतिभास है उसे अतिमौनिता यानी उत्तममोनिता कहते हैं ओर इस जगत्‌ में अनामय, शब्दार्थमात्र यानी सर्वात्मक तथा सत्तासामान्यस्वरूप मैं ही हूँ- इस तरह की ज्ञान स्थिति को सुषुप्त मोन कहते हैं । चूँकि यह आत्मसंवित्‌ अमा यानी सर्वबाधक स्वाकार चरमवृत्ति का भी ग्रास कर लेती है, इसलिए इसमें अपनी, दूसरे की या भेद की कल्पना ही कहाँ ? अतः सब कुछ व्याप्त अनन्त सौषुप्त मौन ही हे । भद्र, प्रवोधयुक्त इस सुषुप्त मौन को ही अनन्त होने से निर्मल तुर्य पद या तुर्यातीत पद समझ लीजिये