Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
वांग्मौनं मौनमित्येतत्सिद्धं तच्च मनः किल ।
मलिनं जीवबन्धाय तत्रस्थः काष्ठतापसः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि तीनों मौनों में मौनत्व सिद्ध है तथापि वे मलिन मन का जो दृढ़ निश्चय है तत्स्वरूप ही हैं,
इसलिए वे तीनो जीव के बन्धन के लिए ही समर्थ हैं, यह कहते है ।
यद्यपि वाणी का मौन मौन है, यह भलीर्भोति सिद्ध हो चुका है तथापि वह मलिनमनोरूप ही है यानी
मलिन मन का दृढ़ निश्चयरूप है; इसलिए वह जीवबन्धन के लिए समर्थ है, इसमें तनिक भी सन्देह
नहीं है । अतः काष्ठतापस भी जीवबन्धन के लिए ही स्थित हुआ है