Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 64, Verses 28–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 64, verses 28–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 28-33
संस्कृत श्लोक
स्वयं संपादितैरेभिर्देशकालक्रियाक्रमैः ।
योगिन्यो योगिनश्चेह तिष्ठन्त्यन्यत्र यत्र च ॥ २८ ॥
इह वामुत्र भोगेन दृष्टमेतदनेकशः ।
कार्तवीर्यो गृहे तिष्ठन्सर्वेषां भयदोऽभवत् ॥ २९ ॥
विष्णुः क्षीरोदधौ तिष्ठन्जायते पुरुषो भुवि ।
पश्वर्थं यान्ति तिष्ठन्त्यो योगिन्यो योगिनीगणे ॥ ३० ॥
शक्रः स्वर्गासने तिष्ठन्याति यज्ञार्थमुर्विकाम् ।
सहस्रमेकं भवति तथा चास्मिञ्जनार्दनः ॥ ३१ ॥
नृणां शतानि भक्तानां मानुष्यं याति तन्नतैः ।
एकः सहस्रं भवति तथा चैष जनार्दनः ॥ ३२ ॥
अंशावतारलीलाभिः कुरुते जागतीं स्थितिम् ।
एकः कान्तासहस्राणि तुल्यकालं निमेषवत् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
के लिए हजार रूप के होते हुए भी फिर एक रूप धारण कर लेते हैं । भगवान् जनार्दन अपने अंशरूप
अवतार-लीलाओं से जगत् की स्थिति बनाये रखते हैं और स्वयं एक ही होकर एक काल में सोलह
हजार रमणियों के साथ उस प्रकार विहार करते हैं जिस प्रकार विदेहरूप को प्राप्त हुए राजा निमि
सब प्राणियों के नेत्रो में रहकर एक साथ निमेष करते है