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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 64, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 64, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

पश्यन्ति चैते नान्योन्यं रुद्रज्ञानादृते ततः । अप्रबुद्धाः प्रजायन्ते जीवा जीवान्तबोधिनः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

तव वे रुद्र की सन्निधि में एक-दूसरे का साक्षात्कार कैसे कर पाये इस पर कहते हैँ । भद्र, एकमात्र रुद्र की इच्छा से ही वे संकल्पजीव तत्त्वज्ञान से रहित ओर जीवों के संसार विशेषों को जाननेवाले होते हैँ तथा उसीकी इच्छा से वे यहाँ शीघ्र रुद्ररूप ओर अनेकरूप हो जाते हैं