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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 60, Verses 9–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 60, verses 9–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 9-15

संस्कृत श्लोक

तत्स्थितं खतया व्योम्नि शब्दे शब्दतया स्थितम् । स्पर्शे स्थितं स्पर्शतया त्वचि तत्त्वक्तया स्थितम् ॥ ९ ॥ रसे लीनं रसतया रसनायां तु तत्तया । रूपे रूपतया दृष्टं नेत्रे लीनं च दृक्तया ॥ १० ॥ ध्राणे घ्राणतया दृष्टं गन्धे गन्धतयोदितम् । पुष्टं कायतया काये भूमावपि च भूतया ॥ ११ ॥ पयस्तया च पयसि वायौ वायुतया स्थितम् । तेजस्तया तेजसि च बुद्धौ बुद्धितया गतम् ॥ १२ ॥ मनस्तया मनस्यन्तरहंकृत्याप्यहंकृतौ । रूढं संविदि संवित्त्या चित्ते चित्ततयोत्थितम् ॥ १३ ॥ वृक्षे वृक्षतया लग्नं पटे पटतयोदितम् । घटे घटतया रूढं वटे वटतयोत्थितम् ॥ १४ ॥ स्थावरे स्थावरत्वेन जंगमत्वेन जंगमे । पाषाणत्वेन पाषाणे चेतनत्वेन चेतने ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाशादि कार्यो में अनुस्यूत उस ब्रह्म का ही, सर्वात्मता के प्रदर्शन के लिए, उनकी विभूतिरूप से वर्णन किया जाता है, यह कहते हैं। वह आत्मा ही आकाश में आकाशरूप से स्थित है, शब्द में शब्दरूप से स्थित है, स्पर्श में स्पर्शरूप से स्थित है और त्वचा में त्वग्रूप से स्थित है। रस में रसरूप से लीन है और रसनेन्द्रिय में रसनेन्द्रियरूप से लीन है। रूप में रूपस्वरूप से दृष्ट है और नेत्र में नेत्ररूप से लीन है । प्राणेन्द्रिय में प्राणरूप से दृष्ट है ओर गन्ध में गन्धरूप से उदित है। शरीर में शरीररूप से पुष्ट है और पृथिवी में पृथिवीरूप से पुष्ट है । दूध में दूधरूप से स्थित है और वायु में वायुरूप से स्थित है। तेज में तेजोरूप से स्थित है और बुद्धि में बुद्धिरूप से स्थित है। मन में मनरूप से स्थित है और अहंकार में अहंकाररूप से स्थित है । बुद्धि में बुद्धिरूप से आरूढ है और चित्त में चित्तरूप से उठा हे | वृक्ष में वृक्षरूप से लगा है ओर पटमें पटरूप से उदित हुआ है । घट में घटरूप से स्थित है ओर वट में वटरूप से उत्थित है । स्थावर में स्थावररूप से स्थित है ओर जंगम में जंगमरूप से स्थित है । पाषाण में पाषाणरूप से स्थित है और चार प्रकार के प्राणियों में चेतनरूप से स्थित हे