Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 58, Verses 7–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 58, verses 7–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 7-17
संस्कृत श्लोक
यत्प्राप्तौ सर्व एवेमे क्षीणा घटपटादयः ।
वराकी वासना तत्र किं करोतु परे पदे ॥ ७ ॥
यथाऽनलगिरिं प्राप्य हिमलेशो विलीयते ।
शुद्धमासाद्य चित्तत्त्वमविद्या लीयते तथा ॥ ८ ॥
क्व वराकी रजस्तुच्छा वासना भोगबन्धनम् ।
क्व पूरितजगज्जालश्चित्तत्त्वविपुलानिलः ॥ ९ ॥
तावत्स्फुरत्यविद्येयं नानाकारविकारिणी ।
यावन्न संपरिज्ञातः शुद्धः स्वात्माऽयमात्मना ॥ १० ॥
सर्वा दृश्यदृशः क्षीणाः स्वच्छतैवोदिता तथा ।
नभसीव पदे तस्मिन्स्वात्मन्यखिलपूरणे ॥ ११ ॥
समग्राकाररूपं तत्समग्राकारवर्जितम् ।
वागतीतं परं वस्तु केन नामोपमीयते ॥ १२ ॥
विषयविषविषूचिकामतस्त्वं निपुणमहंस्थितिवासनामपास्य ।
अभिमतपरिहारमन्त्रयुक्त्या भव विभवो भगवान्भियामभूमिः ॥ १३ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति गदितवति त्रिलोकनाथे क्षणमिव मौनमुपस्थिते पुरस्तात् ।
अथ मधुप इवाऽसिताब्जखण्डे वचनमुपैष्यति तत्र पाण्डुपुत्रः ॥ १४ ॥
अर्जुन उवाच ।
परिगलितसमस्तशोकभारा परमुदयं भगवन्मतिर्गतेयम् ।
मम तव वचनेन लोकभर्तुर्दिनपतिना परिबोधिताब्जिनीव ॥ १५ ॥
इत्युक्त्वोत्थाय गाण्डीवधन्वा स हरिसारथिः ।
अर्जुनो गतसंदेहो रणलीलां करिष्यति ॥ १६ ॥
करिष्यति क्षतगजवाजिसारथिद्रुतक्षरद्रुधिरमहानदीं भुवम् ।
शरोत्करप्रसरमहारजःस्थलीतिरोहितद्युमणिविलोचनां दिवम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
स्थिति कहना तो अत्यन्त ही असंभावित है, यह कहते हैं।
जिसकी प्राप्ति में ये घट, पट आदि सभी स्थूल पदार्थ भी नष्ट हो गये, उस परमपद के विषय में
विचारी परमसूक्ष्म वासना क्या करे ? । जैसे ज्वालामुखी पर्वत को प्राप्तकर हिमलेश बिलकुल विलीन
हो जाता है, वैसे ही शुद्ध चितितत्त्व को प्राप्त कर अविद्या भी विलीन हो जाती हे । कहाँ भोगवन्धनरूप
रजःकण की नाई क्षुद्र विचारी वासना, ओर कहाँ सम्पूर्ण जगत् को अपने में समा लेनेवाले चितितत््वरूप
विपुल पवन ? पार्थ, नाना प्रकार के आकाररूप विकारोंवाली यह अविद्या तव तक प्रस्फुरित होती
है, जब तक शुद्धस्वरूप यह अपना आत्मा तात्त्विकरूप से भलीभाँति जाना नहीं जाता । अपने उदर
में सम्पूर्ण विश्व को निगल जानेवाले, आकाश की नाई शून्यस्वरूप उस स्वात्मरूप ब्रह्मपद में दृश्यों
की सम्पूर्ण दृष्टियाँ क्षीण हो गयी हैं तथा विशुद्धरूपता ही उदित हुई है । जो पूर्णरूप है, समस्त
जगदाकारों से वर्जित है और वाणी से परे हैँ, उस परमवस्तु की भला किससे उपमा दी जा सकती
है ? हे अर्जुन, इसलिए तुम केवल पूर्ण आत्मा के साक्षात्कार से होनेवाली कामनाओं की निवृत्तिरूप
मन्त्र-युक्ति से विषयात्मक विष से उत्पन्न महामारीरूप, निरन्तर प्रवृत्ति की हेतु अन्तःकरणस्थित
वासना का निपुणतापूर्वक निराकरणकर संसारबन्धन से रहित तथा सम्पूर्ण अनर्थो की भूमि
(अभयस्वभाव) मद्रूप ही हो जाओ। यों अन्त में भगवद्गीता के सम्पूर्ण तात्पर्य का संग्रह कर श्रीभगवान्
ने अर्जुन को उपदेश दिया । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, इस प्रकार उपदेश दे चुके त्रिलोकी
के अधिपति भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के, श्वेत-कमल में भ्रमर की नाई, क्षणभर के लिए मौन धारणकर
सामने स्थित हो जाने पर वहाँ पाण्डुपुत्र अर्जुन पुनः यह वचन कहेगा । अर्जुन ने कहा : हे भगवन्,
सम्पूर्ण लोकों का भरण-पोषण करनेवाले आपके वचन से (भगवद्गीतारूप उपदेश से) मेरी यह बुद्धि,
जिसका समस्त शोक भार गल गया है, उस प्रकार परम विकास को प्राप्त हुई है, जिस प्रकार सूर्य से
कमलिनी विकास को प्राप्त होती है । श्रीरामजी, उस प्रकार के वचन कहकर ओर उठकर
गाण्डीवधनुर्धारी, श्रीकृष्णरूप सारथिवाला वह पाण्डुपुत्र अर्जुन सन्देहरहित होता हुआ रणलीला करेगा
यानी युद्ध में जुट जायेगा । श्रीरामभद्र, वह अर्जुन धरातल को ऐसी महानदियों से आक्रान्त कर देगा,
जिनमें आहत बड़े-बड़े हाथी, घोडे, सारथि आदि तत्काल ही बह जायेंगे। और आकाश को भी ऐसा
बना देगा कि उसका सूर्यरूप नेत्र बाणों के ढेरों के प्रसरणों से और बिखरी महाधूलियों से निर्मित
स्थली से आच्छादित हो जायेगा