Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 36, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 36, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
ईश्वर उवाच ।
ततश्चिद्रूपमेवैकं सर्वसत्तान्तरास्थितम् ।
स्वानुभूतिमयं शुद्धं देवं रुद्रेश्वरं विदुः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
ईश्वर ने कहा : हे मुने, चूंकि इस चितिरूप आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर पुरुष फिर संसार में
उत्पन्न नहीं होता, इसलिए समस्त भावपदार्थो के भीतर रहनेवाले अपने अनुभवस्वरूप एकमात्र विशुद्ध
प्रकाशमय चितितत्त्व को ही मुनिलोग संसार -रोग का अपहरण करनेवाला रुद्ररूप ईश्वर जानते हैं
सर्ग सन्दर्भ
पैंतीसवाँ सर्ग समाप्त छत्तीसवाँ सर्ग समस्त विश्व की उत्पत्ति के निमित्त, सर्वाकार से स्थित तथा किसी से स्पर्श न होने के कारण विशुद्ध उस चितितत्त्व के सर्वैश्वर्य का वर्णन ।