Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 27, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 27, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अहो नु चित्रं भगवन्भवता भूषणं श्रुतेः ।
आत्मोदन्तः प्रकथितः परं विस्मयकारणम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी
ने कहा : हे ऐश्वर्यपूर्ण पक्षिराज, कितने हर्ष का विषय है कि आपने अपने प्राण-चिन्तन एवं चिरजीवन
की कहानी, मुझसे कही जो सुनने योग्य कहानियों में भूषणस्वरूप तथा अनेकविध विस्मयों के उत्पादन
में परम कारणभूत है