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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 19, Verses 48–49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 19, verses 48–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 48,49

संस्कृत श्लोक

उल्लङ्घ्य लोकपालानां पुरीस्तपनभास्वराः । आकाशगामिनो लोलाः पवनस्कन्धचारिणः ॥ ४८ ॥ इमं कल्पतरुं प्राप्य निजं नीडं प्रविश्य च । दूरस्थबाधास्तिष्ठामो मुने मौनमवस्थिताः ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

उन्होंने स्नेहपूर्वक हम लोगों का आलिंगन किया और "जाओ" यों आज्ञा तथा आर्शीवाद देकर उत्साहित किया । अनन्तर उन्हें प्रणाम कर हम लोग ब्रह्मलोक से चल पड़े ॥४ ७॥ आकाश-विहार में निपुण, अतिचपल हम लोग वायुलोक में गमन करते हुए सूर्य के सदृश देदीप्यमान लोकपालों की नगरियों का अतिक्रमण कर इस कल्पतरु पर आये ओर अपने घोंसले में प्रविष्ट हुए । हे मुने, यहाँ पर हम लोगों से समस्त बाधाएँ दूर रहती हैं और हम सदा समाधि में अवस्थित रहते हैं