Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
भ्रमच्छिवाङ्गनापक्वमहामांसौदनाकुलम् ।
बहिर्भूतं गृहं यस्य श्मशानं हिमपाण्डुरम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
चक्कर काट रही लोमड़ियों, परिपक्व नर-
मांसों ओर बलि के ओदनो से (भात से) व्याप्त; गाँवों और नगरों से दूर, हिम के सदृश धवल श्मशान
ही उनका घर है । (प्रकृत श्लोक में श्रमच्छिवागना०” ओर बहिर्भूतम्” से दो पद श्लिष्ट होने से
कल्याणकारी वेष- भूषा को धारण कर इधर-उधर धूम रही रमणियों द्वारा पकाये गये प्रशस्ततम मास,
भात आदि भोज्य पदार्थो से व्याप्त तथा सव प्रकार के दोषो से रहित - इस अर्थ की कल्पना की जा
सकती है।)