Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
पपुरुदगुरथोच्चैः सत्वरा जग्मुरूचुर्जहसुरपुरहौषुः पेतुरुच्चैर्ववल्गुः ।
ननृतुरनिशमादुः स्वादु मांसं च देव्यस्त्रिभुवनमपवृत्तं चक्ररुन्मत्तवृत्ताः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
उनके कुछ उन्मत्त वृत्तान्तो का कथन करते हुए प्रकृत विषय का उपसंहार करते हैं।
कुछ देवियाँ पेय पदार्थ पीने लगीं, कुछ तो उच्च स्वर से गर्जने लगीं, कुछ जल्दी से जाने लगीं, कुछ
बोलने लगीं, कुछ हसने लगीं, कुछ परस्पर रक्षा करने लगीं, कुछ एक दूसरे के मुख में या अग्नि में होमने
लगीं, कुछ गिरने लगीं, कुछ ऊँचे से बड़बड़ाने लगीं, कुछ निरन्तर नाचने लगीं, कुछ स्वादु मांस खाने
लगीं, यों उन्होंने उन्मत्त आचरण होकर त्रिभुवन को अपने व्यापार से सद्वर्तन से रहित कर दिया