Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
प्रस्फुरन्मूर्धमणयश्चरन्तो मसृणाङ्गकाः ।
भुजगा वलया यस्य प्रकचत्कनकत्विषः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
क्रमशः तत्-तत् अंगों के भूषण के लिए संचरणशील, सर्वाग से चिकने, प्रस्फुरित हो
रही मस्तकमणियों से राजित तथा सुवर्ण के सदृश दीप्तिसम्पन्न कान्तिवाले सर्प उनके भुजा के कंकण
हैं