Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 17, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 17, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
तृणवद्दृष्टसकलः प्रमेयीकृतसंसृतिः ।
लोकाजवं जवीभावे दृष्टज्ञानपरावरः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त भोगों को उसने तिनके की तरह तुच्छ समझ रक्खा था, इच्छित विषयों की
ओर लोगों की दौड-धूप का फल एकमात्र संसार ही है - यह रहस्य उसने भली प्रकार जान लिया था,
वह परापर ब्रह्म का ज्ञाता था