Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 17
सोलहवाँ सर्ग समाप्त सत्रहवाँ सर्ग जीवन्मुक्तो के उपयोगी गुणों से पूछे गये अर्थ का वर्णन कर पक्षियों का स्वामी भुशुण्ड पुनः उसी को सविस्तार कहने के लिए प्रवृत्त हुआ, यह वर्णन ।
7 verse-groups
- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, तदनन्तर वह पक्षीराज भुशुण्ड वक्ष्यमाण रीति से कहने…
- Verse 2उसके वचन रनेहपूर्णं ओर गम्भीर थे । उसके अभिभाषण के पहले स्मित होता था । हाथ में बिल्व फल…
- Verse 3समस्त भोगों को उसने तिनके की तरह तुच्छ समझ रक्खा था, इच्छित विषयों की ओर लोगों की दौड-धूप…
- Verse 4उसका महान आकार धीर ओर स्थिर था । उसने विश्रान्ति तो उस प्रकार धारण की थी, जिस प्रकार मन्थ…
- Verse 5बाहर से उसकी चारों ओर से बुद्धि में विश्रान्ति थी, वह शान्त था, भीतर से परमानन्द परिपूर्ण…
- Verse 6प्रिय ओर मधुर सुनने योग्य वीणा-गान की नाई मनोहर उसके वाक्य थे । दर्शनमात्र से संपूर्णं भय…
- Verse 7उस प्रकार का पक्षियों का अधिराज भुशुण्ड शुद्ध, अमृतमय, परिपूर्णं स्व-स्वरूप का क्रमशः बोध…