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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 16, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 16, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 16 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ तत्याहमपतं दीप्यमानवपुः पुरः । किंचिद्विक्षोभितसभः खान्नक्षत्रमिवाचले ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, तदनन्तर मैं उस भुशुण्ड के सामने उस प्रकार गिरा (उतरा), जिस प्रकार पर्वत पर आकाश से नक्षत्र गिरता हो । मेरा शरीर अत्यन्त कान्तियुक्त था, गिरने पर मैंने सभा में कुछ हलचल भी पैदा कर दी

सर्ग सन्दर्भ

पन्द्रह्वौँ सर्ग समाप्त सोलहवाँ सर्ग सामने उपस्थित हुए तथा आसन आदि से पूजित हुए महाराज वसिष्ठजी द्वारा किये गये भुशुण्ड के जन्म, कर्म आदि के प्रश्नों का वर्णन ।