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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 125, Verses 2–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 125, verses 2–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 2-7

संस्कृत श्लोक

शान्त एव चिदाभासे स्वच्छे समसमात्मनि । समग्रशक्तिखचिते ब्रह्मेति कलिताभिधे ॥ २ ॥ निर्णीय केचिच्छून्यत्वं केचिद्विज्ञानमात्रताम् । केचिदीश्वररूपत्वं विवदन्ते परस्परम् ॥ ३ ॥ सर्वमेव परित्यज्य महामौनी भवानघ । निर्वाणवान्निर्मननः क्षीणचित्तः प्रशान्तधीः ॥ ४ ॥ आत्मन्येवास्स्व शान्तात्मा मूकान्धबधिरोपमः । नित्यमन्तर्मुखो भूत्वा स्वात्मनान्तः प्रपूर्णधीः ॥ ५ ॥ जाग्रत्येव सुषुप्तस्थः कुरु कर्माणि राघव । अन्तः सर्वपरित्यागी बहिः कुरु यथागतम् ॥ ६ ॥ चित्तसत्ता परं दुःखं चित्तासत्ता परं सुखम् । अतश्चित्तं चिदेकात्मा नय क्षयमवेदनात् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त की सत्ता ही परम दुःख और चित्त की असत्ता ही परम सुख है, इसलिए हे राघव, चिदेकरूप होते हुए आप प्रिय ओर अप्रिय का अनुसन्धान न करके चित्त का नाश कर दीजिये