Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 125

5 verse-groups

  1. Verse 1एक सौ चौबीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ पचीसवाँ सर्ग द्वैत के अपलापरूप तथा सिद्धान्तभूत तुर्यपद…
  2. Verses 2–7चित्त की सत्ता ही परम दुःख और चित्त की असत्ता ही परम सुख है, इसलिए हे राघव, चिदेकरूप होते…
  3. Verse 8प्रिय ओर अप्रिय का अनुसन्धान न करके यह जो कहा है, उसीको स्पष्ट करते हैं। रम्य या अरम्य वस…
  4. Verse 9सुख-दुःख और इन दोनों के साधनों की (संसार- सागर को पार कर जाने की इच्छा रखनेवाले प्राणी को…
  5. Verse 10जिसने तीनों लोकों की सभी वस्तुओं के सारका ज्ञान कर लिया है अतएव जो चारों ओर स्वतः फैले हु…