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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 123, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 123, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

एतावदेव खलु लिंगमलिंगमूर्तेः संशान्तसंसृतिचिरभ्रमनिर्वृतस्य । तज्ज्ञस्य यन्मदनकोपविषादमोहलोभापदामनुदिनं निपुणं तनुत्वम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

रागशून्य होने से जो फल होते हैं उनका तत्त्वज्ञानी के लक्षणो के रूप में वर्णन करते हुए महाराज वसिष्टजी उपसंहार करते है। जिसका स्वरूप समस्त धर्मो से रहित ब्रह्मचैतन्य बन गया है तथा तत्त्वज्ञान से दीर्घकालिक सांसारिक भ्रम की निवृत्ति हो जाने के कारण जो विश्रान्त हो चुका है ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुष का इतना ही लक्षण है कि उसमें काम, क्रोध, विषाद, मोह, लोभ आदि आपत्तियों का प्रतिदिन अत्यन्त अपक्षय ही रहता हे