Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 123, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 123, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अणिमाद्यपि संप्राप्तं तादृशैरेव भूरिशः ।
यत्नेन साधितत्वात्तैर्नेतरेणात्मदर्शिना ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि अणिमा आदि सिद्धियों को दूसरे प्राप्त नहीं कर सकते, इसलिए उनमें अपूर्व शब्द का अर्थ
(अनन्यप्राप्तत्व) भी घटता है, तथापि अनेक मन्त्रसिद्ध आदि पुरुषों द्वारा उनकी प्राप्ति की गयी है;
इसलिए उनमें भी अपूर्वता नहीं है, यह कहते हैं।
मन्त्रसिद्धि आदि से युक्त उन्हीं नानाविध सिद्धों ने प्रयत्नपूर्वक साधन कर जिन अणिमा आदि
सिद्धियों की प्राप्ति की है उन सिद्धियों की भी आत्मज्ञानी विद्वान् ने अनायास ही प्राप्ति कर ली है,
इसलिए उनमें भी अपूर्वता नहीं है