Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 123, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 123, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
एवं स्थिते हि भगवञ्जीवन्मुक्तस्य सन्मतेः ।
अपूर्वोऽतिशयः कोऽसौ भवत्यात्मविदां वर ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
कहे गये लक्षणोवाले जीवन्मुक्त पुरुष में मणि, मन्त्र आदि के द्वारा सिद्ध हुए पुरुषो की नाई
आकाशगमन आदि सिद्धरूप भी कोई विशेष है या नहीं इस तरह के सन्देह से युक्त श्रीरामचन््रजी
पूषतेहै।
हे आत्मज्ञानियों मे श्रेष्ठ भगवन्, जैसा कि आपने जीवन्मुक्तो के लक्षणों का वर्णन किया है वैसा
ही यदि है, तो आत्मज्ञानी जीवन्मुक्त पुरुष में (अन्य सिद्धो की अपेक्षा) कौन-सा विशेष रहता है ?
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ बाईसर्वोँ सर्ग समाप्त एक सौ तेईसवाँ सर्ग अज्ञानी अन्य सिद्धं की अपेक्षा ज्ञानी के परिपूर्णं होने से उसको आकाशगमन और अणिमादि सिद्धियों की इच्छा ही नहीं होती, इस विशेष बात का वर्णन ।