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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verses 4–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, verses 4–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 4-9

संस्कृत श्लोक

स्वसंवेदनरूपा च षष्ठी भवति भूमिका । आनन्दैकघनाकारा सुषुप्तसदृशस्थितिः ॥ ४ ॥ तुर्यावस्थोपशान्ताथ मुक्तिरेवेह केवलम् । समता स्वच्छता सौम्या सप्तमी भूमिका भवेत् ॥ ५ ॥ तुर्यातीता तु यावस्था परा निर्वाणरूपिणी । सप्तमी सा परिप्रौढा विषयः स्यान्न जीवताम् ॥ ६ ॥ पूर्वावस्थात्रयं त्वत्र जाग्रदित्येव संस्थितम् । चतुर्थी स्वप्न इत्युक्ता स्वप्नाभं यत्र वै जगत् ॥ ७ ॥ आनन्दैकघनीभावात्सुषुप्ताख्या तु पञ्चमी । असंवेदनरूपाथ षष्ठी तुर्यपदाभिधा ॥ ८ ॥ तुर्यातीतपदावस्था सप्तमी भूमिकोत्तमा । मनोवचोभिरग्राह्या स्वप्रकाशपदात्मिका ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

छठी भूमिका स्व-संवेदनरूप होती है यानी छठी भूमिका का स्वरूप स्वभावतः ही नष्ट न होनेवाली ब्रह्माकारानुभववृत्ति है । इसका आकार एकमात्र आनन्दघन है और इसकी स्थिति सुषुप्त पुरुष की-सी रहती है । ब्रह्माकारानुभवात्मक वृत्तिरूप तुर्यावस्था (५) (छठी भूमिका) भी जिसमें विलीन हो जाती है, ऐसी मुक्तिरूप अवस्था ही सप्तम भूमिका है, यही अवस्था समता, स्वच्छता और परिपूर्णतारूप है, इसमें केवल पूर्णस्वप्रकाशस्वरूप परब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है सबसे उत्तम मुक्तिरूप जो तुर्यातीत अवस्था है, वह जब विदेहमुक्ति में पर्यवसित हो जाती है, तब जीवित योगियों की विषय नहीं होती । इन सातों में जो पहले की तीन भूमिकाएँ विद्यमान हैं, वे जाग्रत्रूप ही हैं और चौथी जो भूमिका है वह तो स्वप्न ही कही गयी है, क्योकि उसमें जगत्‌ स्वप्न के सदुश रहता है। आनन्द के साथ एकीभाव हो जाने से पाँचवीं अवस्था सुषुप्तरूप है तथा अन्य पदार्थो के ज्ञान से रहित एकमात्र स्वसंवेदनरूप छठी भूमिका तुर्यशब्द से कही जाती हे । तुर्यातीत शब्द से कहलानेवाली अवस्था सातवीं भूमिका सबसे अन्तिम हे । यह अवस्था मन और वाणी से परे है तथा केवल स्वप्रकाशपब्रह्मरूप ही है