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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verses 1–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 1- 3

संस्कृत श्लोक

मनुरुवाच । शास्त्रसज्जनसंपर्कैः प्रज्ञामादौ विवर्धयेत् । प्रथमा भूमिकैषोक्ता योगस्यैव च योगिनः ॥ १ ॥ विचारणा द्वितीया स्यात्तृतीयाऽसङ्गभावना । विलापनी चतुर्थी स्याद्वासनाविलयात्मिका ॥ २ ॥ शुद्धसंविन्मयानन्दरूपा भवति पञ्चमी । अर्धसुप्तप्रबुद्धाभो जीवन्मुक्तोऽत्र तिष्ठति ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

“परं समेत्य तानवम्‌“ इस पहले सर्ग के श्लोकांश से भूमिका के अभ्यास का जो फल कहा गया है उस फल की प्राप्ति में कारणभूत जो अलग-अलग भूमिकाएँ है उनका वर्णन करते हैं। मनु महाराज ने कहा : हे राजन्‌, सबसे पहले शास्त्र और सज्जनों की संगति से अपनी बुद्धि बढ़ानी चाहिए, यही योग की या योगी की पहली भूमिका कही गयी है । निष्कर्ष यह है कि साधनचतुष्टय की प्राप्ति तथा गुरु एवं सतीर्थ्य (सहपाठी) आदि की सहायता लेकर किया गया श्रवण ही पहली भूमिका है और यही उत्पत्ति प्रकरण में दर्शायी गयी हे । मनन दूसरी भूमिका है, असंग अद्वितीय आत्मा की भावना यानी निदिध्यासन तीसरी भूमिका है और तत्त्वसाक्षात्कार से अज्ञान आदि निखिल प्रपंच की निवृत्ति करनेवाली विलापनी नाम की चौथी भूमिका है, यही चौथी भूमिका अविद्याविलयरूप कही जाती है । समाधि के परिपाक से हुआ विशुद्ध संविद्रूप प्रकाशमय जो आनन्द है उस आनन्द की स्वरूपभूत पाँचवीं भूमिका है, इस भूमिका में जीवन्मुक्त पुरुष आधे सोये या जागे हुए पुरुष के सदृश रहता है; जैसे निद्राशेष से आधा सोया हुआ पुरुष या आधा जागा हुआ पुरुष बाहर के शब्द आदि को जानते हुए भी भीतर से निद्रासुख में आसक्त होकर उत्तर-प्रत्युत्तर करने की इच्छा नहीं करता वैसे ही व्यवहारदशा में भी योगी इस भूमिका में आसक्त होकर बाह्य व्यवहारों से उदासीन ही रहता है

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ उन्नीसर्वोँ सर्ग समाप्त एक सौ बीसवाँ सर्ग मुक्ति चाहनेवाले पुरुष के लिए आरम्भ की तीन, मुक्त होनेवाले के लिए चौथी ओर मुक्त हुए पुरुष के लिए आगे की तीन -योँ सात भूमिकाओं का वर्णन ।