Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
एकः कर्ता च भोक्ता च क इवाङ्गोपपद्यते ।
भावनां सर्वभावेभ्यः समुत्सृज्य समुत्थितः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त देह, इन्द्रिय आदि पदार्थो से अहन्ताध्यास को भलीभाँति हटाकर
अलग हुआ चन्द्र के सदृश शीतल परिपूर्ण ज्ञानीपुरुष दीप्ति से सूर्य के सदृश चमकने लग जाता है