Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
तद्दग्धबीजवद्भूयो नाङ्कुरं प्रविमुञ्चति ।
देहेन्द्रियादिना कर्म करणौघेन कल्प्यते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रिय, देह, इन्द्रिय आदि भिन्न-भिन्न जो कारण हैं
उन्हीं के द्वारा कर्म किये जाते है । ऐसी स्थिति में एक कर्ता ओर एक भोक्ता की उपपत्ति कैसे हो सकती
है यानी जो समुदाय कर्म करता है वह समुदाय ही उस कर्मफल का भोक्ता हो सकता है, असंग अद्वितीय
एक आत्मा नहीं