Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verses 16–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
तृणाग्रेष्वम्बरे भानौ नरनागामरेषु च ।
यत्तदस्ति तदेवेति मत्वा भूयो न शोचति ॥ १६ ॥
तिर्यगूर्ध्वमधस्तान्मे व्यापको महिमा चितः ।
तस्यानन्तविलासस्य ज्ञात्वेति क इव क्षयी ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अत्यन्त
तुच्छ तृणों के अग्रभाग में, असीम आकाश में अत्यन्त प्रकाशशील सूर्य में, मनुष्यों में, नागों में,
देवताओं में जो प्रसिद्ध सन्मात्रस्वरूप है, प्रत्यक्चिन्मात्रस्वरूप वही मैं हूँ, यों जानकर फिर इस
संसाररूप शोक से ग्रस्त नहीं होता । ऊपर, नीचे एवं अगल-बगल सर्वत्र चिद्रूप मेरी ही महिमा
व्यापकरूप से विद्यमान हे, इस प्रकार असीम विलासोवाले उस परमात्मा की महिमा जानकर कौन
ऐसा पुरुष होगा, जो जन्म-मरण आदि दुःखों से युक्त रहेगा ?