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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verses 14–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

अलेपकोऽहमजरो नीरागः शान्तवासनः । निर्मलोऽस्मि चिदाकाश इति मत्वा न शोचति ॥ १४ ॥ अहमन्तादिरहितः शुद्धो बुद्धोऽजरामरः । शान्तः समासमाभास इति मत्वा न शोचति ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं लिप्त नहीं हूँ,अजर हूँ, नीराग हूँ, वासनाओं से शून्य हूँ और निर्मल चैतन्यरूप आकाश हूँ, ऐसा मानकर पुरुष शोक से छूट जाता है। मैं अन्त और आदि से रहित हूँ, शुद्ध हूँ, ज्ञानी हूँ, अजर हूँ, अमर हूँ, शान्त हूँ, सम-विषम सभी पदार्थों में एकरूप से प्रकाशमान हूँ, ऐसा मानकर पुरुष शोक से परे हो जाता है