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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 117, Verses 13–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 117, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

भाः स्वभावसमुत्पन्ना ब्रह्मस्फुरणशक्तयः । काश्चिद्ब्रह्माण्डतां यान्ति काश्चिद्गच्छन्ति भूतताम् ॥ १३ ॥ अन्यास्त्वन्यत्वमायान्ति भवत्येवं जगत्स्थितिः । न बन्धोऽस्ति न मोक्षोऽस्ति ब्रह्मैवास्ति निरामयम् । नैकमस्ति न च द्वित्वं संवित्सारं विजृम्भते ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

तब बहुस्यां प्रजायेय“ इत्यादि संकल्प करके ब्रह्म मेँ जगत्‌ और जीवभाव का प्रतिपादन करनेवाली श्रुति काक्या अभिप्राय है, इस आशंका पर कहते हैं। तेज के स्वभाव से उत्पन्न हुई ब्रह्म की स्फुरणशील कोई शक्तियाँ तो स्थूल समष्टि के अभिमान (&) दर्पण की सत्ता जैसे प्रतिबिम्बो में है वैसे ही संसगध्यास से ब्रह्म की सत्ता से अनुविद्ध यद्यपि जगत्‌ है, तथापि इसकी स्वतः सत्ता नहीं ही है, इसलिए "तन्नास्ति नृप किंचन” यह जो कहा गया है वह बिलकुल ठीक ही है, यह भाव है । से ब्रह्माण्डरूप में विवर्तित हो जाती हैं; कोई पृथिवी आदि के अभिमान से प्राणिरूपता को प्राप्त हो जाती हैं और इनसे अतिरिक्त जो कोई शक्तियाँ है वे अन्यता को यानी चार तरह के प्राणियों के रूप में प्राप्त हो जाती हैं इस तरह जगत्‌ की स्थिति होती है