Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 115, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 115, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
अन्तर्मुखः सन्सततं समस्तं कुर्वन्बहिष्ठं खलु कार्यजातम् ।
न खेदमायासि कदाचिदेव निराकृताहंकृतितामुपैषि ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रिय, इस संसार में जो कुछ
भी दिखाई पडता है, वह सब कल्पो में प्रसिद्ध कार्य और कारण का मूल कारण निर्विकार परमात्मस्वरूप
परब्रह्म ही है। वह बड़े-बड़े अनेक सर्गो से विशाल आकारवाला होनेपर भी असल में आकाशरूप ही है,
यानी सम्पूर्ण विकल्पों से निर्मुक्त ही हे । चूँकि कहीं पर कुछ भी पदार्थ चाहे वह स्थूल हो, चाहे सूक्ष्म हो
या चाहे कारणरूप हो, सदैकरस परब्रह्म से भिन्न किसी तरह नहीं हो सकता, इसलिए हे साधो, आप
“मैं सद्रूप ब्रह्म हूँ", इस प्रकार का अपने अन्दर निश्चय करके सर्वप्रथम समाधि के अभ्यास का बल प्राप्त
कर स्थित रहिये। तदनन्तर फिर क्रम से सप्तम भूमिका के ऊपर चढ़कर सम्पूर्ण आशंकाओं के विलास
को छोड़कर बैठ जाइये ॥ ४ १,४ २॥ हे साधो, यदि आप अन्तर्मुख होकर अहंकारशून्य स्वरूप को प्राप्त
हो जाते हैं, तो बाहर के समस्त कार्यो का निरन्तर सम्पादन करते हुए भी आप कभी भी खेद को नहीं
प्राप्त होते हैं