Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verse 61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
निःसंसृतिर्विगतमोहभयो विरागो नित्योदितः समसमाशयसर्वसौम्यः ।
सर्वात्मकः सकलसंकलनावियुक्त आकाशकोशविशदः सममास्थितोऽस्मि ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आपसे भिन्न कोई दूसरा है ही नहीं, तो आप फिर किस स्वरूप से अवशिष्ट हैं, इस पर
कहते हैं ।
संसारशून्य, मोह और भय से रहित, रागादि दोषों से मुक्त, नित्यप्रकाशरूप, सर्वत्र एकरूप की
भावना से युक्त, सब तरह से सौम्य, सर्वस्वरूप, सकल कल्पनाओं से निर्मुक्त, आकाशकोश के
समान स्वच्छ मेँ एकरूप होकर स्थित हूँ