Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
देहे यस्मिंस्तु नो चित्तं नापि सत्त्वं च विद्यते ।
स तापे हिमवद्राम पञ्चत्वेन विलीयते ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
निवसिनिक मन का विनाश हो जाने पर मृत देह भी विलीन हो जाती है, यह कहते हैं ।
हे श्रीरामजी, जिस देह में न तो चित्त और न निर्वासनिक मन ही रहता हे वह ताप में हिम की नाई
मरण द्वारा विलीन हो जाती है