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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verses 28–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 28,29

संस्कृत श्लोक

चित्तस्पन्दो हि सर्वेषां कारणं जगतः स्थितेः । राम भावविकाराणां कुसुमानां यथा मधुः ॥ २८ ॥ अस्मिन्प्रयास्यतो देहे चेतसो हि मुहुर्मुहुः । हर्षः कोपो न संमोहो वशमेति रघूद्वह ॥ २९ ॥ चित्ते प्रशममायाते कायो यः सत्त्ववर्जितः । बाधते नाम्बरस्येव तस्य भावविकारभूः ॥ ३० ॥ वीच्यादि न यथोदेति समाया जलसंततेः । तथा न दृश्यते दोषः समायाः सत्त्वसंततेः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

वह क्यो, इस पर कहते हैं। हे श्रीरामजी, जगत्‌ के व्यवहार के हेतुभूत सम्पूर्ण भावविकारों का कारण चित्तस्पन्द उस तरह है, जिस तरह कुसुमं का वसन्त हे श्रीरामजी, इसलिए इस देह से देहान्तर में जानेवाले चित्त का इस देह में बार-बार प्रयत्नपूर्वक निगृहीत किया जा रहा भी हर्ष, कोप और सम्मोह रोका नहीं जा सकता, यही (&) अवश्य भोक्तव्य उसके शेष प्रारब्ध कर्म को अपनी बुद्धि से देखकर उस चूडाला ने फिर विचार किया, यह सूचित करने के लिए “महामति” यह विशेषण दिया गया है | दूसरे जन्म में हेतु है