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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verses 1–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, verses 1–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 1-22

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । निर्विकल्पसमाधानात्काष्ठकुड्योपमस्थितिः । एवं शिखिध्वजो राजा चूडालामधुना श्रृणु ॥ १ ॥ शिखिध्वजं तं भर्तारं कुम्भवेषेण तेन सा । प्रबोध्यान्तर्धिमागत्य ततार तरसा नभः ॥ २ ॥ देवपुत्राकृतिं व्योम्नि जहौ मायाविनिर्मिताम् । विदग्धमुग्धमाकारं स्त्रैणं जग्राह सुन्दरम् ॥ ३ ॥ नभसा स्वपुरं प्राप विवेशान्तःपुरं क्षणात् । दृश्या बभूव लोकस्य नृपकर्म चकार च ॥ ४ ॥ वासरत्रितयेनाथ पुनरम्बरमेत्य सा । बभूव कुम्भो योगेन शिखिध्वजवनं ययौ ॥ ५ ॥ तथा तत्रैव तं भूपमपश्यद्वनभूमिगा । निर्विकल्पसमाधिस्थं समुत्कीर्णमिव द्रुमम् ॥ ६ ॥ अहो नु खलु भो दिष्ट्या विश्रान्तोऽयमिहात्मनि । स्थितः स्वस्थः समः शान्त इत्युवाच पुनःपुनः ॥ ७ ॥ तदेनं तावदेतस्माद्बोधयामि परात्पदात् । इदानीमेव किं देहत्यागमेष करोति वै ॥ ८ ॥ किंचित्कालं स्फुरत्वेष राज्येन विपिनेन वा । सममेव गमिष्यावस्त्यक्तदेहाविमौ समौ ॥ ९ ॥ तस्योपदेशो विषमः परिणामं न गच्छति । अनेनाभ्यासयोगेन तावदाबोधयाम्यहम् ॥ १० ॥ इति संचिन्त्य चूडाला सिंहनादं चकार सा । भूयोभूयः प्रभोरग्रे वनेचरभयप्रदम् ॥ ११ ॥ न चचाल शिलेवाद्रौ यदा नादेन तेन सः । भूयोभूयः कृतेनापि तदा सा तं व्यचालयत् ॥ १२ ॥ चालितः पातितोऽप्येष यदा न बुबुधे नृपः । तदा संचिन्तयामास चूडाला कुम्भरूपिणी ॥ १३ ॥ अहो परिणतः साधुः स्वपदे भगवानयम् । तदेनं हि कया युक्त्या सांप्रतं बोधयाम्यहम् ॥ १४ ॥ अथवैनं महात्मानं किमर्थं बोधयाम्यहम् । विदेहं बोधमासाद्य तिष्ठत्वेष यथासुखम् ॥ १५ ॥ अहमप्यंगनादेहमिमं त्यक्त्वा परं पदम् । अपुनर्जननायैव गच्छामीह हि किं समम् ॥ १६ ॥ इति संचिन्त्य देहं स्वं त्यक्तुमभ्युद्यता सती । पुनः संचिन्तयामास चूडाला सा महामतिः ॥ १७ ॥ आलोकयामि चैतावदेनं देहं महीपतेः । यद्यस्य सत्त्वशेषोऽस्ति बोधबीजं हृदन्तरे ॥ १८ ॥ तत्कालेनैष भगवान्संप्रबोधमुपैष्यति । मूलकोशरसालीनं पुष्पजालमिव द्रुमे ॥ १९ ॥ तदेवं विरहञ्जीवन्मुक्त एव भवत्यलम् । मुक्तो भवत्यथ यदि मन्ये गच्छामि तत्समम् ॥ २० ॥ इति संचिन्त्य चूडाला स्पर्शनेन नयेन च । पतिमालोक्य साशङ्कमुवाच वरवर्णिनी ॥ २१ ॥ अस्त्येव सत्त्वशेषोऽस्य हृदि संबोधकारणम् । संबोधहेतूदयेन सत्त्वशेषं व्यबुध्यत ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

को मैं क्‍यों जगाऊँ ? विदेहमुक्ति प्राप्तकर सुखपूर्वक अवस्थित रहे न। मैं भी अब यह महिला का शरीर छोड़कर अपुनर्जन्म के लिए साथ ही चली जाऊँ, इस जीवन में कौन-सा अधिक सुख रखा हे यों सोचकर अपना शरीर छोड़ने के लिए वह सती चूडाला जब बिलकुल तैयार हो गई तब एक बार फिर उसने विचार किया, क्योकि वह एक महा-बुद्धिमती (५) थी। पहले राजा के इस शरीर को तो देख लूँ कि इसमें बोध के बीजभूत वासनाशून्य मन का संस्कारलेशरूप से कुछ शेष यदि प्रारब्ध से बची हुई माया के लेश से उपहित हार्द ब्रह्य मेँ हे तब तो उसके उद्भव का समय आने पर यह भगवान स्वयं प्रबोध को उस प्रकार प्राप्त होगा, जिस प्रकार वसन्त के आरम्भ में वृक्ष के मूलप्रदेश में अवस्थित पृथिवी के रस में सृक्ष्मभाव से लीन भावि पुष्प समूह । इसलिए मेरे द्वारा प्रबोधित होकर मेरे ही समान जीवन्मुक्तरूप से विहार कर रहा यह स्थित रहे | यदि यह मैं समझ लेती हूँ कि यह मुक्त हो गया हे तो मेँ अभी इसके साथ चली जाती हू । यों विचारकर सुन्दरवर्णवाली, उस चूडाला ने स्पर्शरूप हेतु द्वारा देह की गरमी जानकर अभी जीता है - यों अपने पति को आशंकापूर्वक देखकर जागने के जो कारण होते हैं उनके लाभ से जान लिया कि इसमें सत्व अभी अवशिष्ट है । ओर उसने यह कहा कि इसके हृदय में अभी सत्त्व तो बचा हुआ हे