Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 1, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 1, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
प्रहरस्यार्धमात्रं ते तत आमुद्रितेक्षणाः ।
उत्स्वप्नमाययुर्निद्रां क्षणाद्विद्रावितश्रमाम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
उन्होंने केवल आधे प्रहर (दो घड़ी) तक ही नयनों को मूँदकर उत्तम स्वप्न से युक्त तथा क्षणभर में श्रम
का निवारणकर देनेवाली निद्रा प्राप्त की | यहाँ पर युन्दर स्वप्नयुक्त निद्रा प्राप्त हुई इस कथन का
तात्पर्य भावी शुभ फल का सूचन करने में है, क्योकि 'अथ य॒त्र देव इव“ इत्यादि श्रुति से यह प्रतिपादन
किया गया है कि स्वप्न में सवत्म्यिदर्शन भावी मोक्षरूप फल का सूचक होता है